Friday, June 18, 2021
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गुरु गृह कुंडली के प्रमुख तथा ज्ञान के अधिपति गृह | Guru grah in hindi

गुरु गृह के बारे मे

ज्योतिष में बृहस्पति को एक शुभ ग्रह माना गया है। लाल किताब जो कि पूरी तरह से उपाय आधारित ज्योतिष पद्धति है। इसमें बृहस्पति ग्रह के विभिन्न भावों में फल और उनके प्रभाव के बारे में विस्तार से व्याख्या की गई है।

ऋग्वेद के अनुसार बृहस्पति को अंगिरस ऋषि का पुत्र माना जाता है और शिव पुराण के अनुसार इन्हें सुरुप का पुत्र माना जाता है। इनके दो भ्राता हैं: उतथ्य एवं सम्वर्तन। इनकी तीन पत्नियां हैं। प्रथम पत्नी शुभा ने सात पुत्रियों भानुमति, राका, अर्चिश्मति, महामति, महिष्मति, सिनिवली एवं हविष्मति को जन्म दिया था। दूसरी पत्नी तारा से इनके सात पुत्र एवं एक पुत्री हैं तथा तृतीय पत्नी ममता से दो पुत्र हुए कच और भरद्वाज। गुरुवार के व्रत में बृहस्पति देव की आरती करने का विधान माना जाता है।

बृहस्पति ने प्रभास तीर्थ के तट भगवान शिव की अखण्ड तपस्या कर देवगुरु की पदवी पायी। तभी भगवाण शिव ने प्रसन्न होकर इन्हें नवग्रह में एक स्थाण भी दिया। कच बृहस्पति का पुत्र था या भ्राता, इस विषय में मतभेद हैं। किन्तु महाभारत के अनुसार कच इनका भ्राता ही था। भारद्वाज गोत्र के सभी ब्राह्मण इनके वंशज माने जाते हैं।

गुरु गृह कुंडली मे

वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह को ‘गुरु’ कहा जाता है। यह धनु और मीन राशि का स्वामी होता है और कर्क इसकी उच्च राशि है जबकि मकर इसकी नीच राशि मानी जाती है। गुरु ज्ञान, शिक्षक, संतान, बड़े भाई, शिक्षा, धार्मिक कार्य, पवित्र स्थल, धन, दान, पुण्य और वृद्धि आदि का कारक होता है। ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह 27 नक्षत्रों में पुनर्वसु, विशाखा, और पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र का स्वामी होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिस व्यक्ति पर बृहस्पति ग्रह की कृपा बरसती है उस व्यक्ति के अंदर सात्विक गुणों का विकास होता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति सत्य के मार्ग पर चलता है।

बृहस्पति, जिन्हें “प्रार्थना या भक्ति का स्वामी” माना गया है,और ब्राह्मनस्पति तथा देवगुरु (देवताओं के गुरु) भी कहलाते हैं, एक हिन्दू देवता एवं वैदिक आराध्य हैं। इन्हें शील और धर्म का अवतार माना जाता है और ये देवताओं के लिये प्रार्थना और बलि या हवि के प्रमुख प्रदाता हैं। इस प्रकार ये मनुष्यों और देवताओं के बीच मध्यस्थता करते हैं।

बृहस्पति हिन्दू देवताओं के गुरु हैं और दैत्य गुरु शुक्राचार्य के कट्टर विरोधी रहे हैं। ये नवग्रहों के समूह के नायक भी माने जाते हैं तभी इन्हें गणपति भी कहा जाता है। ये ज्ञान और वाग्मिता के देवता माने जाते हैं। इन्होंने ही बार्हस्पत्य सूत्र की रचना की थी। इनका वर्ण सुवर्ण या पीला माना जाता है और इनके पास दण्ड, कमल और जपमाला रहती है। ये सप्तवार में बृहस्पतिवार के स्वामी माने जाते हैं। ज्योतिष में इन्हें बृहस्पति (ग्रह) का स्वामी माना जाता है।

ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह का गोचर जन्मकालीन राशि से दूसरे, पाँचवें, सातवें, नौवें और ग्यारहवें भाव में शुभ फल देता है। जिन व्यक्तियों की जन्म कुंडली में बृहस्पति ग्रह मजबूत स्थिति में होता है तो जातक के जीवन में प्रगति होती है। हालाँकि इस दौरान जातक के मोटे होने की भी संभावना बनी रहती है। गुरु के आशीर्वाद से व्यक्ति को पेट से संबंधित रोगों से छुटकारा मिलता है। कुंडली में यदि कोई भाव कमज़ोर हो और उस पर गुरु की दृष्टि पड़ जाए तो वह भाव मजबूत हो जाता है।

मनुष्य जीवन पर गुरु का प्रभाव

शारीरिक रूपरेखा तथा स्वभाव – जिस व्यक्ति के लग्न भाव में देव गुरु स्वयं स्थित हो तो वह व्यक्ति भाग्यशाली होता है। इसके प्रभाव से जातकों का व्यक्तित्व सुंदर और आकर्षक होता है। ऐसे व्यक्ति उच्च शिक्षित, ज्ञानवान और उदारवादी विचारों के होते हैं। गुरु के प्रभाव से व्यक्ति धार्मिक और दान पुण्य करने वाला होता है। व्यक्ति को भम्रण करने में आनंद आता है और आध्यात्मिक ज्ञान को पाने के लिए जातक आतुर रहता है। यदि जन्म कुंडली में गुरु प्रथम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति के जीवन में धन का आगमन होता है और वह रत्न व स्वर्ण को धारण करता है।

बली गुरु के प्रभाव – हम जानते हैं कि कर्क बृहस्पति ग्रह की उच्च राशि है। अतः गुरु इस राशि में बलवान होगा। बली गुरु के प्रभाव से व्यक्ति को विभिन्न क्षेत्रों में लाभ प्राप्त होगा। जातक शिक्षा के क्षेत्र में अव्वल रहेगा। उसके जीवन में धन की वृद्धि होगी। व्यक्ति का पूजा पाठ में मन लगेगा। जिस व्यक्ति का गुरु बलवान होता है वह ज्ञानी और ईमानदार होता है। वह सदैव सत्य के मार्ग पर चलता है। बली गुरु के कारण व्यक्ति को संतान सुख की प्राप्ति होती है।

पीड़ित गुरु के प्रभाव – बली चंद्रमा के कारण व्यक्ति को गुरु से शुभ फल प्राप्त होते हैं। लेकिन इसके विपरीत पीड़ित बृहस्पति जातकों के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। इसके कारण जातक को विभिन्न क्षेत्रों में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यदि कोई व्यक्ति शिक्षा क्षेत्र से जुड़ा है तो उसे इस क्षेत्र में परेशानियाँ आएंगी। पीड़ित गुरु के कारण व्यक्ति की वृद्धि थम जाती है और उसके मूल्यों का ह्लास होता है। पीड़ित गुरु व्यक्ति को शारीरिक कष्ट भी देता है। व्यक्ति को नौकरी तथा विवाह आदि में परेशानी का सामना करना पड़ता है। इस स्थिति में व्यक्ति को गुरु के ज्योतिषीय उपाय करने चाहिए।

रोग – ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह से व्यक्ति को पेट से सबंधित रोग, अपच, पेट दर्द, एसिडिटी, कमज़ोर पाचन तंत्र, कैंसर जैसी बीमारी होने का ख़तरा रहता है।

कार्यक्षेत्र – ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह अध्यापन, संपादन कार्य, पनवाड़ी, हलवाई, इत्र का कार्य, फिल्म निर्माण, पीली वस्तुओं का व्यापार, आभूषण विक्रेता आदि कार्यों से संबंध रखता है।

उत्पाद – स्टेशनरी से संबंधित वस्तुएँ, खाद्य उत्पाद, मक्खन, घी, मिष्ठान, संतरा, केला, हल्दी, पीले रंग के पुष्प, चना, दाल आदि वस्तुओं को बृहस्पति ग्रह से दर्शाया जाता है।

स्थान – स्टेशनरी की दुकान, अदालत, धार्मिक पूजा स्थल, विद्यालय, कॉलेज, विधानसभा आदि।

जानवर तथा पक्षी – ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह घोड़ा, बैल, हाथी, बाज, पालतू जानवर, मोर, व्हेल मछली, डॉल्फिन आदि पशु-पक्षियों तथा जानवरों को दर्शाता है।

जड़ – केले की जड़।

रत्न – पुखराज।

रुद्राक्ष – पाँच मुखी रुद्राक्ष।

यंत्र – गुरु यंत्र।

रंग – पीला

बृहस्पति से संबंधित मंत्र –

गुरु का वैदिक मंत्र
ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।
यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।।

गुरु का तांत्रिक मंत्र ॐ बृं बृहस्पतये नमः

बृहस्पति का बीज मंत्र ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः

बृहस्पति ग्रह का महत्व

सनातन धर्म के अनुसार, बृहस्पति ग्रह को देव गुरु माना जाता है। महाभारत के अनुसार बृहस्पति महर्षि अंगिरा के पुत्र हैं। पौराणिक शास्त्रों के बृहस्पति ग्रह ब्रह्मा जी का भी प्रतिनिधित्व करता है। सप्ताह में बृहस्पतिवार का दिन गुरु को समर्पित है। अतः इस दिन गुरु की आराधना की जाती है। हिन्दू धर्म में केले के वृक्ष को गुरु के रूप में पूजा जाता है। बृहस्पति गुरु का वर्ण पीला है। शास्त्रों में गुरु को शील और धर्म का अवतार माना गया है।

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